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 अमेरिकी प्रोफेसर को चीन से संबंध रखने पर होगी सजा

अमेरिकी प्रोफेसर को चीन से संबंध रखने पर होगी सजा



घोषणा से 4 दिन पहले कहा- मुझे कैंसर है, जेल नहीं जाना चाहता

विदेश | अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रह चुके चाल्र्स लीबर को चीन से कनेक्शन रखने और उसे छिपाने के आरोप में 26 अप्रैल को सजा सुनाई जाएगी। इससे पहले उन्होंने बोस्टन शहर के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में एक याचिका दायर की है।

इसमें चाल्र्स ने कहा है, ’मुझे ऐसा कैंसर है, जिसका पूरी दुनिया में कोई ईलाज नहीं है। इसलिए मुझे जेल न भेजा जाए।’ उन्होंने अपने किए पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा, ’चीन से संबंध रखने के चलते मेरी छवि पहले ही खराब हो चुकी है। मुझे जानकारी छुपाने पर पछतावा है।

चीन की विजिट मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी

कोर्ट में दायर याचिका में 64 साल के प्रोफेसर चाल्र्स ने लिखा है कि कुछ हफ्तों के लिए चीन का दौरा करने पर मेरी पूरी जिंदगी तबाह हो गई। उनके वकील ने कहा कि प्रोफेसर अपनी बची हुई जिंदगी अकेले अपने घर में रहकर जीना चाहते हैं।

वकील ने चाल्र्स को दूसरे तरीकों से सजा देने का सुझाव दिया है। जैसे 6 महीने के लिए हाउस अरेस्ट में रखकर या एक साल तक पुलिस की निगरानी में रखकर।

इन आरोपों के दोषी हैं अमेरिकी प्रोफेसर

2012 से 2015 के बीच चीन की वुहान यूनिवर्सिटी से जुड़कर उसके टैलेंट प्रोग्राम में हिस्सा लेने के लिए। इससे चीन की साइंटिफिक डेवलेपमेंट को बढ़ाने के मकसद से तैयार किया गया था।

अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट के मुताबिक प्रोफेसर को वुहान यूनिवर्सिटी ने स्ट्रैटेजिक साइंटिस्ट के तौर पर रखा था। इस दौरान उन्हें चीन से हर महीने 50 हजार अमेरिकी डॉलर मिलते थे। उन्होंने इसकी जानकारी इनकम टैक्स विभाग को नहीं दी।

लीबर ने चीन से अपने रिश्ते को अमेरिका से छिपाए रखा। वो ये साबित नहीं कर पाए की वुहान में उनका बैंक अकाउंट नहीं था। जिसमें वो चीन से मिलने वाली सैलरी रखते थे।

2021 के दिसंबर महीने में उन्हें इन सभी आरोपों में दोषी पाया गया था।

डोनाल्ड ट्रम्प की चलाई मुहीम के तहत प्रोफेसर को होगी सजा

बीबीसी के मुताबिक इस तरह के आरोपों में दोषी पाए जाने पर 26 साल की जेल की सजा होती है। इसके अलावा 9 करोड़ 84 लाख रुपए का जुर्माना भी देना पड़ता है। ये अमेरिका के हाई प्रोफाइल मामलों में से एक है।

चीन से रिश्ते रखने की जांच होने के शुरूआत डोनाल्ड ट्रम्प ने 2018 में शुरू की थी। इसे चाइना इनिशिएटिव यानी चीन की पहल नाम दिया गया था। इसका मकसद अमेरिकी अनुसंधान और उद्योगों में कथित चीनी जासूसों के खिलाफ मुकदमा चलाने था।

इसकी अमेरिका और दूसरे देशों में काफी आलोचना हुई थी। लोग का कहना था कि इस मुहीम से रिसर्च के कामों में परेशानी होती है। चीन से संबंध रखने को हमेशा जासूसी के कटघरे में रखकर नहीं देखा जाना चाहिए।

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