पूनिया को उपनेता बनाने पर क्या बोले राजेंद्र राठौड़- अडाणी से रिश्तों को लेकर कांग्रेस पर उठाए सवाल; कहा- असली लड़ाई अब
जयपुर | भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान में उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ को नेता प्रतिपक्ष बना दिया है। अब राठौड़ पूरी तरह एक्शन मोड में आ गए हैं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में राठौड़ ने कहा- चुनावी साल में ही असली लड़ाई शुरू होगी।
साथ ही राठौड़ ने खुद को मुख्यमंत्री पद की रेस से बाहर बताया। उन्होंने वसुंधरा राजे और सतीश पूनिया को लेकर चल रही सियासी खींचतान पर भी अपनी बात रखी।
राजस्थान विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ की बातचीत...
सवाल- नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद पहली प्राथमिकता क्या रहेगी?
जवाब- राजस्थान की कांग्रेस सरकार से जनता त्रस्त हो चुकी है। ऐसे में इस को हटाना मेरी पहली प्राथमिकता रहेगी। आज जो मुद्दे आम आदमी के लिए परेशानी का कारण बन गए हैं।
उन्हें सड़क से लेकर सदन तक पुरजोर तरीके से उठाएंगे, क्योंकि राजस्थान में फिलहाल सिर्फ घोषणा वीर सरकार काम कर रही है। जो घोषणाएं कर भूल जाती है।
आज जब सरकार के कार्यकाल के अंतिम सात महीने का वक्त बचा है। सरकार पिछली सरकार की कमियों को नहीं गिना सकती, क्योंकि उन्हें 4 साल से ज्यादा वक्त काम करने का राजस्थान की जनता ने दिया है। ऐसे में अब कांग्रेस को अपना रिपोर्ट कार्ड दिखाना चाहिए। ना कि पूर्व सरकार पर आरोप लगाने चाहिए। इसलिए अब हम सरकार के चेहरे पर लगी नकाब को हटाने का काम करेंगे।
सवाल- विधानसभा सत्र अब काफी कम होंगे। ऐसे में क्या आप को नेता प्रतिपक्ष बनाकर लॉलीपॉप देने की कोशिश की गई है?
जवाब- प्रतिपक्ष का नेता कॉन्स्टिट्यूशनल पोस्ट होती है। अगर गुलाब चंद कटारिया हमारा नेतृत्व कर रहे होते तो बेहतर होता। उनके अनुभव को देखते हुए पार्टी ने उन्हें राज्यपाल की जिम्मेदारी दी है। इस नाते इस पद पर मेरा चयन हुआ है।
इसमें यह कहना गलत होगा कि अब समय नहीं बचा है। मेरे हिसाब से तो समय अभी शुरू हुआ है, क्योंकि लड़ाई अभी शुरू होगी। नेता प्रतिपक्ष अपने आप में एक वजूद रखता है। जनता की नजर में हम उस वजूद को लेकर जनता की आवाज बनेंगे।
सवाल- आपके समर्थक चाहते हैं, आप मुख्यमंत्री बने, क्या आप भी खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते हैं?
जवाब- कतई नहीं मानता हूं, ना भूत ना भविष्य मैं खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं मानता हूं। मेरे जैसे कार्यकर्ता को पार्टी ने जो दायित्व दिया है। मैं उसे ही भार मानता हूं। वैसे भी हमारे यहां पदों को मांगा नहीं जाता है।
हमारे यहां आलाकमान समय के अनुकूल निर्णय करता है। मैं समझता हूं कि मेरे जैसे व्यक्ति को ना कभी पद की भूख पहले थी और ना ही आगे रहेगी। आगे भविष्य में क्या होगा, इस पर आलाकमान ही आखिरी फैसला लेगा।
सवाल- वसुंधरा राजे पिछले लंबे वक्त से ज्यादा सक्रिय नहीं थी। आप भी लंबे वक्त बाद उनसे मिलने गए। क्या बातचीत हुई?
जवाब- वसुंधरा जी के साथ कुछ पारिवारिक और स्वास्थ्य संबंधी परेशानी थीं। उनकी पुत्रवधू लंबे समय तक कैंसर जैसे रोग से पीड़ित रहीं। इस वजह से वह परेशान थीं। वह हमारी दो बार की मुख्यमंत्री और पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।
सवाल- क्या आप वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते हैं?
जवाब- वसुंधरा जी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानने का मेरा कोई अधिकार नहीं है। हमारे पास विश्व के सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी का चेहरा है। उनकी जनकल्याण नीतियां है। ऐसे में हमारे लिए यह मायने नहीं रखता कि चेहरा कौन होगा या फिर कौन नहीं होगा।
सवाल- बीजेपी ने सतीश पूनिया को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर उपनेता बना दिया। कांग्रेस इसे जाट और किसान विरोधी फैसला बता रही है?
जवाब- उपनेता छोटा पद नहीं होता है। मैं भी उस पद पर रहा हूं। सतीश जी ने अच्छा काम किया है। मुझे लगता है उससे बेहतर काम अब करेंगे।
सवाल- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान क्या बातें हुई थीं?
जवाब- शिष्टाचार मुलाकात थी। पीएम ने शुभकामनाएं दी थीं और काम करते रहने का मार्गदर्शन दिया था। इस मुलाकात को जीवन के एक शानदार क्षणों का हिस्सा मानता हूं। मेरा लक्ष्य कांग्रेस को दहाई तक नहीं पहुंचने देना है।
सवाल- अडाणी से लेकर विधायकों के इस्तीफे के मुद्दों पर बीजेपी को वो सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी?
जवाब- मैं शुरू से कह रहा हूं कि अडाणी को गहलोत सरकार ने जो रियायतें दी हैं उस पर श्वेत पत्र जारी होना चाहिए। कांग्रेस का डबल फेस क्यों है? एक तरफ तो राहुल गांधी अडाणी पर सवाल खड़े करते हैं और दूसरी तरफ गहलोत सरकार उन्हें रियायतें देती है। विधायकों का इस्तीफा प्रकरण लोकतंत्र के साथ मजाक था। उम्मीद है कि इससे जुड़ा फैसला नजीर बनेगा।
सवाल- कांग्रेस और सीएम कहते हैं कि बीजेपी हिंदू-मुस्लिम टकराव कराकर चुनाव जीतने की रणनीति पर काम करती है?
जवाब- कांग्रेस और सीएम इस तरह की बचकानी बातें करके खुद की कमियां छिपाने का काम करते हैं। प्रदेश में कानून व्यवस्था के हालात किससे छिपे हैं।
चूरू जिले के हरपालसर निवासी राजेंद्र राठौड़ जयपुर में छात्र राजनीति में सक्रिय रहे। उन्हें साल 1980 के विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी ने जयपुर की बनीपार्क विधानसभा सीट (जयपुर) से टिकट दिया था।
बनीपार्क क्षेत्र सीमांकन के बाद विद्याधर नगर सीट में मर्ज हो गया है। वे बुरी तरह हारे और तीसरे नंबर पर रहे। इसके बाद जनता पार्टी ने 1985 में उन्हें चूरू विधानसभा सीट से मौका दिया, वे जमकर लड़े, लेकिन दूसरे नंबर पर रहे।
तीसरी बार में जीते थे विधानसभा चुनाव
राठौड़ को इन दो चुनाव में हार के बाद वर्ष 1990 में तीसरी बार चूरू सीट से ही जनता दल ने टिकट दिया। इस बार वे पहले नंबर पर रहे और विधानसभा पहुंचे।
वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव से पहले राजेंद्र राठौड़ भाजपा में शामिल हो गए। उन्हें चुरू सीट पर दावेदारी के लिए भाजपा से टिकट मिला और जीते।
इसके बाद से ही वे अब तक भाजपा की टिकट पर लगातार जीतते रहे हैं। उन्होंने चूरू और तारानगर विधानसभा सीट (चूरू) पर जब भी दावेदारी की, वे जीते। वर्ष 2003 के बाद उनकी गिनती भाजपा के बड़े नेताओं में होने लगी।
राजेंद्र राठौड़ भाजपा की वसुंधरा सरकार में दो बार कैबिनेट मंत्री और 1990-93 में डिप्टी चीफ व्हिप के पद पर रहते हुए विधानसभा के सबसे अनुभवी सदस्यों में शामिल हैं।
राठौड़ ने कई बार भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार के लिए संकट मोचक का काम किया। राजे के पहले कार्यकाल में जब ललित मोदी को लेकर आरोप लगे थे। तो राठौड़ सामने आकर कांग्रेस के हमलों का मुकाबला करते थे।
साल 2009 में विपक्ष में रहते भाजपा में उबाल आ गया था, तब राजेंद्र राठौड़ वसुंधरा राजे के नजदीकियों में शामिल थे और उन्होंने मोर्चा संभाला था।
उस दौरान राजे नेता प्रतिपक्ष थी, भाजपा आलाकमान ने उनसे इस्तीफा मांग लिया था। राजे ने करीब 6 माह तक नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा नहीं दिया था। इसके लिए दिल्ली में विधायकों को लेकर शक्ति प्रदर्शन भी किया था।
तब राजेन्द्र राठौड़ और रोहिताश्व शर्मा ने बयान दिया था कि अगर वसुंधरा राजे को हटाया गया तो वे पार्टी छोड़ देंगे और नई पार्टी भी बना सकते हैं।
इस बयानबाजी को अनुशासनहीनता मानते हुए राठौड़ और ज्ञानदेव आहूजा को निलंबित भी किया गया था।
हालांकि पार्टी के दबाव में वसुंधरा राजे ने फरवरी, 2010 में नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन एक साल बाद वसुंधरा राजे को वापस नेता प्रतिपक्ष बनाया गया।

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