हरियाणा सीमा पर किसानों के जाम से करोड़ों लोग परेशान। युद्ध जैसे हालात क्यों?
- एमएसपी पर वादाखिलाफी की है तो लोकसभा चुनाव में भाजपा को हरा देना चाहिए।
- राहुल गांधी बताएं कि कांग्रेस के शासन में एमएसपी पर कानून क्यों नहीं बना? स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट तो 2006 में ही आ गई थी।
(एस.पी.मित्तल)
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अजमेर। 14 फरवरी को दूसरा दिन रहा जब पंजाब और हरियाणा के शंभू बॉर्डर पर किसानों और पुलिस के बीच टकराव होता रहा। किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली जाना चाहते हैं, लेकिन हरियाणा पुलिस ने किसानों को फिलहाल पंजाब की सीमा पर रोक रखा है। पंजाब में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार है, इसलिए किसानों को शंभु बॉर्डर पर आने तक कोई परेशानी हुई है। लेकिन भाजपा शासित हरियाणा की पुलिस ने पंजाब से आए किसानों को हरियाणा में घुसने का फिलहाल मौका नहीं दिया है। किसानों को पंजाब में ही रोकने के लिए पुलिस आंसू गैस के गोले दाग रही है। रबड़ की गोलियों के इस्तेमाल होने की खबरें भी आ रही है। पंजाब के खासकर सिख समुदाय के किसानों की ताकत को देखते हुए पुलिस ने शंभु बॉर्डर पर कंक्रीट की दीवार खड़ी करने के साथ साथ सड़क पर नुकीले सरिए लगा दिए हैं। बॉर्डर पर युद्ध जैसे हालात बने हुए है। इससे करोड़ों लोगों को परेशानी हो रही है। इसी बार्डर से लाखों लोग दिल्ली, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में आते जाते हैं। अब लोगों को लंबा सफर तय करना पड़ रहा है। आसपास के क्षेत्रों में फल सब्जी उगती है, वह भी खराब होने लगी है। इससे किसानों को ही नुकसान हो रहा है। कई क्षेत्रों में पेट्रोल डीजल की कमी हो गई है। इससे भी लोगों को भारी परेशानी हो रही है। किसानों की मांग है कि उन्हें दिल्ली जाने दिया जाए ताकि वे अपनी मांगों को केंद्र सरकार के समक्ष रख सके। वहीं सरकार का कहना है कि जब अनेक मंत्री आंदोलनकारी किसानों के प्रतिनिधियों से लगातार संवाद कर रहे हैं, तब किसान जबरन दिल्ली क्यों आना चाहते हैं? केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा का कहना है कि किसानों की 90 प्रतिशत मांगे मानी ली गई है। कुछ मांगे विधायी प्रणाली से जुड़ी हुई है, इसलिए पूरा होने में समय लगेगा। मुंडा का कहना है कि आंदोलन में शामिल कुछ लोग देश के माहौल को बिगाड़ना चाहते हैं। जानकार सूत्रों के अनुसार किसानों और सरकार के बीच न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर कानून बनाने को लेकर टकराव है। किसानों का कहना है कि दो साल पहले मोदी सरकार ने कानून बनाने की बात कही थी, लेकिन अब अपने वादे से मुकर रही है। सब जानते हैं कि किसी सरकार को सबक सिखाने का सबसे अच्छा अवसर चुनाव होता है। देश में दो माह बाद लोकसभा के चुनाव होने हैं। यदि मोदी सरकार ने एमएसपी पर वादाखिलाफी की है तो लोकसभा चुनाव में किसानों को भाजपा को हरा देना चाहिए। लोकतंत्र का तो यही मतलब होता है। लोकतंत्र में हाईवे को जाम करने के कोई मायने नहीं है। भारत में यदि वोट देने का अधिकार न हो तो फिर सरकार के खिलाफ सड़क पर आंदोलन जायज है। पंजाब में आम आदमी पार्टी ने चुनाव के जरिए ही सत्ता हासिल की है। पंजाब के किसानों ने जिस प्रकार पंजाब में केजरीवाल के प्रति भरोसा जताया है उसी प्रकार लोकसभा चुनाव में भी केजरीवाल के प्रति भरोसा जताते हुए प्रधानमंत्री बना देना चाहिए। लोकतंत्र में अपनी मांग को पूरा करवाने के लिए करोड़ों लोग को परेशान करना उचित नहीं है। आंदोलनकारी किसानों को यह भी समझना चाहिए कि पंजाब में खालिस्तान के समर्थक सक्रिय हो गए है। खालिस्तान आंदोलन का खामियाजा पूर्व में पूरे देश ने उठाया है। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को तो अपना बलिदान भी देना पड़ा। अभी भले ही आंदोलन किसानों के प्रतिनिधियों के हाथ में हो, लेकिन खालिस्तान के समर्थक कभी भी आंदोलन में घुसपैठ कर सकते हैं। मौजूदा राजनीतिक हालातों में अरविंद केजरीवाल किसान आंदोलन से खुश हो सकते हैं, लेकिन यदि खालिस्तान समर्थकों की वजह से आंदोलन बेकाबू हुआ तो केजरीवाल के साथ-साथ पंजाब को भी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में पंजाब के किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका है। पंजाब के किसान की मेहनत की वजह से ही भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हुआ है। ऐसे में पंजाब के किसानों को समझदारी दिखानी चाहिए।
कांग्रेस ने कानून क्यों नहीं बनाया:
शंभु बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन पर राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस आंदोलन का समर्थन करती है। यानी एमएसपी पर कानून बनाने पर राहुल गांधी भी सहमत है, लेकिन सवाल उठता है कि कांग्रेस जब केंद्र में सत्ता में थी, तब कानून क्यों नहीं बनाया? स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट वर्ष 2006 में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को सौंप दी थी। इस रिपोर्ट में ही एमएसपी पर कानून बनाने का सुझाव दिया गया था। कांग्रेस 2014 तक सत्ता में रही, लेकिन एमएसपी पर कानून नहीं बनाया। असल में दुनिया के किसी भी देश में ऐसा कानून नहीं है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता है कि उसके उत्पादक को सरकार ऊंची कीमत पर अनिवार्य रूप से खरीदे। यह सही है कि एक उद्योगपति के मुकाबले में किसान के सामने ज्यादा चुनौतियां है। इसलिए सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को लागू किया। सरकार ने गेहूं से लेकर दलहन उत्पादन के लिए एमएसपी का निर्धारण कर रखा है। ताकि किसान को लागत का मूल्य तो मिल ही सके। कांग्रेस माने या नहीं लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद किसानों के हित में कई निर्णय लिए गए है। इनमें किसानों को प्रतिवर्ष छह हजार रुपए की सम्मान निधि मिलना भी शामिल हैं। कांग्रेस ने अपने शासनकाल में एमएसपी पर साढ़े पांच लाख करोड़ की खरीद की। जबकि मोदी सरकार ने दस वर्ष के कार्यकाल में 18 लाख करोड़ रुपए की खरीद की है। यानी एमएसपी पर किसान की उपज खरीदने में मोदी सरकार ने कोई कंजूसी नहीं की। आज तो बाजार में किसानों को एमएसपी से भी ज्यादा की राशि मिल रही है।

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