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शरीर से करें आत्मकल्याण का प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण

शरीर से करें आत्मकल्याण का प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण

 



-नवीन प्रेरणाओं से जनता नित्य हो रही लाभान्वित  

-कालूयशोविलास का सरस आख्यान भी निरंतर बढ़ रहा आगे 


घोड़बंदर रोड, मुम्बई (महाराष्ट्र) :  मुम्बई महानगर के बाहरी भाग सूरत-मुम्बई हाइवे के सन्निकट बना नन्दनवन परिसर वर्तमान में मुम्बई का आध्यात्मिक केन्द्र बना हुआ है। मुम्बई के विभिन्न उपनगरों से आने वाले श्रद्धालुओं का रास्ता भले अलग हो सकता है, किन्तु गंतव्य स्थल नन्दनवन ही है। नन्दनवन में वर्ष 2023 का चतुर्मास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में पहुंचकर श्रद्धालु असीम शांति का अनुभव कर रहे हैं। शांतिदूत की आभा से प्राप्त होने वाली मानसिक शांति और श्रीमुख से प्रवाहित होने वाला ज्ञान जन-जन के मानस को नवीन चिंतन प्रदान कर रहा है। 


मंगलवार को तीर्थंकर समवसरण में उपस्थित जनता को तीर्थंकर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी ने भगवती सूत्र आगम के माध्यम से मंगल प्रवचन प्रदान करते हुए कहा कि प्रवृत्ति के तीन साधनों मन, वाणी और काया की बात बताई गई। इनमें दो साधनों की विस्तार से चर्चा प्राप्त होने के बाद गौतम स्वामी ने प्रवृत्ति के तीसरे माध्यम काया अर्थात् शरीर के संदर्भ में भी प्रश्न किए और भगवान महावीर ने उनके प्रश्नों को समाहित किया। 


भगवान महावीर ने कहा कि शरीर और आत्मा का बहुत गहरा सम्बन्ध होता है। शरीर के बिना आत्मा को खुली आंखों से नहीं देखा जा सकता है। शरीर और आत्मा एक दूसरे से अभिन्न भी है और भिन्न भी बताया गया है। शरीर में आत्मा होती है तो अनुभूति भी होती है। कहीं कांटा चुभ जाए, कहीं कट जाए, कहीं चोट लग जाए तो आदमी को अनुभूति होती है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि शरीर और आत्मा एक है। दूसरी ओर कोई मर जाए तो आत्मा आगे चली जाती है और स्थूल शरीर यही रह जाता है तो इसलिए शरीर और आत्मा अलग-अलग भी हैं। आत्मा और काया पानी-दूध, मिट्टी-सोना मिलीजुली होती है। शरीर रूपी भी है और अरूपी भी है। शरीर सचित्त भी है और अचित्त भी है। 


मनुष्य यह सोचे कि इस मानव शरीर का कितना बढ़िया सदुपयोग हो सके। मृत्यु के बाद भौतिक धन व स्थूल शरीर भी साथ नहीं जाता, किन्तु कर्म और धर्म तो साथ ही जाता है। आदमी जैसा कर्म करता है, फल तो साथ ही जाता है। साधु साधना के बाद शरीर भले साथ न ले जा सके, किन्तु उसकी आत्मा के साथ संवर और निर्जरा अवश्य जाता है, जो आत्मकल्याण में सहायक बनता है। सामान्य मनुष्य भी सौभाग्य से प्राप्त इस मानव जीवन का सम्यक् सदुपयोग करते हुए अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करना चाहिए। 


आचार्यश्री ने कालूयशोविलास के रोचक आख्यान में पूज्य कालूगणी द्वारा अपने युवाचार्य के रूप में मुनि तुलसी को घोषित करने, साध्वियों द्वारा गलत विधि से वंदन से रोकने, सही विधि से वंदन करने आदि की बातों को वर्णित किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन विश्व भारती के पदाधिकारियों आदि ने साध्वी कमलप्रभाजी (लाडनूं) की जीवनी ‘संयम का खिलता कमल’ पुस्तक लोकार्पित की। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में पावन आशीर्वाद प्रदान किया। अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी द्वारा आयोजित अणुव्रत गीत महासंगान के बैनर का लोकार्पण किया श्री अनूपचंद बोथरा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। 

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