साधु की सही पहचान थे जैन आचार्य विद्यासागर महाराज।
- अजमेर में दीक्षा स्थल बनाया पर लाख मनुहार के बाद भी नहीं आए।
(एस.पी.मित्तल)
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अजमेर। जैन आचार्य विद्यासागर महाराज 18 फरवरी को छत्तीसगढ़ कें चंद्र गिरी तीर्थ में ब्रह्मलीन हो गए। मीडिया में विद्यासागर महाराज को लेकर अनेक सकारात्मक खबरें प्रसारित हो रही है, लेकिन देखा जाए तो विद्यासागर महाराज साधु की सही पहचान थे। 78 वर्ष की उम्र में उनके ब्रह्मलीन होने पर देश भर जो शोक का माहौल देखा गया वह उनकी साधु की पहचान को बताता है। देश भर में फैले जैन समाज के व्यापारियों ने न केवल अपने प्रतिष्ठान बंद रखे, बल्कि जैन मंदिर में जाकर अपनी संवेदना प्रकट की। 22 वर्ष की उम्र में साधु की दीक्षा लेने के बाद उन्होंने जैन तीर्थों का बहुत विकास कराया। अरबों रुपया खर्च करवाने के बाद भी उनके मन में कभी भी घमंड नहीं आया और न ही उन्होंने अपने लिए एक कमरा भी बनवाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोी ने भी कई बार विद्यासागर जी से आशीर्वाद प्राप्त किया। ऐसा नहीं कि धनाढ्य व्यक्ति ही उनके अनुयायी थे। जैन समाज का साधारण व्यक्ति भी आचार्य श्री के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त कर सकता था। उनके व्यवहार और कार्यशैली को लेकर कभी भी कोई आपत्ति नहीं हुई। देशभर के जैन समाज ने हमेशा आचार्य जी का सम्मान किया। कई अवसरों पर देखा जाता है कि किसी जैन मुनि और जैन समाज के प्रतिनिधियों के बीच मनमुटाव हो जाता है। लेकिन विद्यासागर महाराज को लेकर कभी भी विपरीत बात सुनने को नहीं मिली। असल में वे मन से भी साधु थे, इसलिए उनके मन में कभी भी द्वेष नहीं रहा। साधु प्रवृत्ति के कारण विद्यासागर महाराज हमेशा छोड़ने को तैयार रहते थे। उन्होंने चीनी, नमक, हरी सब्जी, फल, अंग्रेजी औषधि का तो त्याग किया ही साथ ही सोने के लिए तख्त का भी त्याग कर दिया। वे जमीन पर चटाई पर सोते थे। अंतिम दिनों में तो आचार्य ने बोलना भी छोड़ दिया। ब्रह्मलीन के 77 दिन पहले तक उन्होंने अपनी जुबान से एक शब्द भी नहीं निकाला। यहां तक कि आचार्य पद भी त्याग दिया। त्यागने की इस प्रवृत्ति के कारण ही विद्यासागर महाराज अजमेर नहीं आए। आचार्य श्री 30 जून 1968 को अजमेर में महावीर सर्किल के निकट दीक्षा ग्रहण की थी। अजमेर जैन समाज के प्रतिनिधि चाहते थे कि आचार्य श्री एक बार दीक्षा स्थल पर आए, इसके लिए जैन समाज के अजय जैन ने दीक्षा स्थल पर कीर्ति स्तंभ का निर्माण भी कराया। इस स्तंभ में आचार्य श्री के जीवन से जुड़े भित्ति चित्र भी उकेरे गए। इतना ही नहीं जैन समाज ने नारेली तीर्थ में पंच कल्याणक महोत्सव करवाने का प्रस्ताव भी आचार्य श्री के सामने रखा। लेकिन इसके बावजूद भी आचार्य श्री ने अपने दीक्षा स्थल पर आने पर रुचि नहीं दिखाई। अजमेर का नारेली तीर्थ आज देश भर में प्रसिद्ध है। लेकिन यहां बने मंदिरों में प्रतिमाओं की स्थापना नहीं हो पाई है। आरके मार्बल संस्था के अध्यक्ष और जैन समाज के प्रमुख प्रतितिनधि अशोक पाटनी ने भी इस बात के प्रयास किए कि विद्यासागर महाराज नारेली तीर्थ पधारे, लेकिन अशोक पाटनी को भी सफलता नहीं मिली। जो लोग विद्यासागर महाराज को दीक्षा स्थल और नारेली तीर्थ बुलाना चाहते थे, उन्हें अब सह समझ लेना चाहिए कि आचार्य श्री सही मायने में साधु थे। साधु के मन में किसी के भी प्रति विशेष प्रेम और द्वेष नहीं होता। भले ही विद्यासागर महाराज के दीक्षा स्थल पर कीर्ति स्तंभ बना दिया गया, लेकिन साधु कभी भी अपनी कीर्ति से प्रभावित नहीं होता। नारेली तीर्थ में प्रतिमाओं की स्थापना की जिम्मेदारी किसी साधु संत की नहीं, बल्कि जैन समाज के प्रतिनिधियों की सकारात्मक भूमिका की है।

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