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 टोंक में दूध-छाछ की थैलियों से बन रहे हैंड बैग

टोंक में दूध-छाछ की थैलियों से बन रहे हैंड बैग



हथकरघे पर हो रहे तैयार, पर्यावरण प्रदूषण और गंदगी से मिलेगी राहत

टोंक | टोंक जिले के आवां कस्बे में विद्याशीष हथकरघा ने वेस्ट से बेस्ट बनाने और पॉलिथीन मुक्त भारत बनाने में नवाचार किया है। यहां हथकरघे पर बनाए जाने वाले खादी वस्त्रों की तरह दूध, दही, छाछ की वेस्टेज थैलियों से जूट के साथ मिलाकर हैंड बैग बनाए जा रहे है। विद्याशीष हथकरघा का दावा है कि देशभर में इस तरह का नवाचार पहला है। एक कार्य एक पखवाड़े पहले ही शुरू किया है।

विद्याशीष हथकरघा आवां के संचालक आशीष जैन शास्त्री का दावा है कि कुछ समय बाद प्रदेश के महानगरों समेत बड़े जिलों व शहरों से इन थैलियों का संग्रहण कराया जाएगा। फिर बड़े स्तर पर बैग बनाए जाएंगे। यह नवाचार पॉलिथीन मुक्त भारत बनाने में काफी मददगार साबित होगा। साथ ही पर्यावरण प्रदूषण, गंदगी से मिलेगी राहत मिल रही है। इस काम से कई बेरोजगारों को रोजगार मिल रहा है। अभी 20 महिलाएं इससे रोजगार पा रही है। एक महिला या अन्य व्यक्ति हथकरघे में एक दिन में 5-6 बैग बनाकर करीब 300-400 रुपए रोजाना कमा लेते हैं। एक छोटे बैग की कीमत डेढ़ रुपए है। करीब 300 ग्राम वजनी इस बैग में 10 किलो वजनी सामान रखकर ले जा सकते हैं।आज के समय में घरों-होटलों में रोजाना दूध, दही, छाछ आदि खाद्य वस्तुओं की प्लास्टिक की थैलियों को कचरे में फेंक दिया जाता है, जिससे पर्यावरण पर गंभीर दुष्परिणाम होते हैं। प्लास्टिक की यह थैलियां नष्ट नहीं होती है। इन थैलियों के प्लास्टिक में एक हानिकारक रसायन पॉलीविनाइल क्लोराइड होता है, जो मिट्टी में दबे रहने पर भूजल को जहरीला बना देता है। पॉलिथीन के इन दुष्परिणाम से लोगों को राहत दिलाने के लिए विद्याशीष हथकरघा ने इन थैलियों के बैग बनाने की सोची। फिर कुछ लोगों को मेहनताना देकर ये थैलियां एकत्रित करवाई और फिर इनसे खादी वस्त्र की तरह बैग बनाना शुरू किया। अभी रोजाना 50 बैग बनाए जा रहे हैं। धीरे-धीरे थैलियों की उपलब्धता के अनुसार इनकी संख्या बढ़ाई जाएगी।


इस तरह बनाया जाता है पॉलिथीन बैग

इन बैगों को तैयार करने के लिए सबसे पहले बाजार से पॉलिथीन एकत्रित की जाती है। उसके बाद उनकी सफाई की जाती है और फिर उनको एक विशेष आकार में काटा जाता है। कटी हुई थैलियों को हथकरघा (हैंडलूम मशीन) पर जूट के साथ संयोजन में चला कर बैग का निर्माण किया जाता है। इन बैग की विशेष बात यह है कि इनमें किसी भी प्रकार की सिलाई नहीं लगती। पूरे बैग का निर्माण हाथ के माध्यम से हथकरघा मशीन पर ही किया जाता है। इस प्रकार से बने बैग बहुत ही सुंदर और आकर्षक होते है और इनका उपयोग भी लंबे समय तक किया जा सकता है। ये वजन में बहुत ही हल्के लेकिन मजबूत तथा टिकाऊ होते है।

पीएम के विजन को कर रहा है सार्थक

प्लास्टिक के फिर से उपयोग कर बने इन बैग की देशभर में एवं विदेशों में मांग है। जलवायु एवं पर्यावरण संरक्षण के साथ ही पॉलिथीन के निस्तारण में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन स्वच्छ भारत और प्लास्टिक मुक्त भारत में भी यह उत्पाद अपनी महती भूमिका निभा रहा है।


2017 में हुई थी हथकरघा की स्थापना

हथकरघा के संचालक आशीष जैन ने बताया कि विद्याशीष हथकरघा आवां की स्थापना सन 2017 में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के आशीर्वाद से हुई थी। यहां पर टावल, बेडशीट, साड़ी आदि बनाए जाते हैं। यहां की बनी हुई साड़ी आवां साड़ी के नाम से प्रसिद्ध है, जो आज भारत की प्रसिद्ध साड़ियों में शामिल है। यहां के उत्पादों को रेमंड्स जैसी नामी कंपनी भी खरीदती है। यहां के कई बुनकरों को जिला स्तरीय राज्य स्तरीय पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं। यहां के उत्पाद बड़े-बड़े डिजाइनर बुटीक सेंटर वह भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा आयोजित होने वाली राज्य स्तरीय राष्ट्रीय स्तरीय प्रदर्शनों में विक्रय के लिए जाते है ।

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